70 सालों से टैक्स चोरी की तरकीबें निकाली जाती थीं, लोगों को टैक्स देने की आदत डालनी होगी: वित्त मंत्री

नई दिल्ली। आज वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी लागू होने के बाद पहली बार लोगों को संबोधित किया. इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टेड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया (आईसीएआई) के स्थापना दिवस के समारोह के कार्यक्रम में खास तौर पर जीएसटी से जुड़ी बातों पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री ने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए जीएसटी लागू किया गया है. कार्यक्रम में राजस्व सचिव हसमुख अधिया ने भी जीएसटी से जुड़े फायदों और तकनीकी पहलुओं पर रोशनी डाली.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि टैक्स न देना किसी का भी फंडामेंटल राइट नहीं हो सकता. देश में 70 सालों से चले आ रहे टैक्स चोरी के माइंडसेट को बदलना होगा. जिन कारोबारियों का टर्नओवर करोड़ों में है वो सही टैक्स सिस्टम न होने के चलते टैक्स देते ही नहीं थे. जीएसटी लागू होने पर उन लोगों को टैक्स देने की आदत डालनी ही होगी जो अभी तक टैक्स देने से बचते थे.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि भारत को विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए नागरिकों को टैक्स चोरी से बचने जैसा योगदान देना ही होगा. इनडायरेक्ट टैक्स में केवल एक टैक्स हो जिसमें पुराने टैक्स की सारी खामियों खत्म की जाएं, इसके लिए ही जीएसटी लाया गया है. इसके फायदे साफ हैं कि टैक्स फाइल करने के मल्टीपल इंटरफेस खत्म होंगे.

टैक्स न देना पड़े उसका 70 सालों से सिस्टम बन चुका था
देश में 70 सालों में ये सिस्टम बन चुका था कि कैसे टैक्स न दिया जाए, इसके अलावा टैक्स चोरी की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली टैक्स व्यवस्था के चलते लोगों ने टैक्स न देना ही बेहतर समझा. टैक्स के ऊपर टैक्स जैसी व्यवस्था से होने वाली करोड़ों लोगों को टैक्स देना सबसे बड़ी परेशानियों में से एक लगता था. इसी को दूर करने के लिए जीएसटी को लाया गया है.

हर बजट के बाद मांग उठती है कि हेल्थकेयर, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा में ज्यादा खर्च किया जाए लेकिन इसके लिए सरकार पैसा कहां से लाएगी. आजादी के बाद के 70 सालों से देश में यही व्यवस्था रही थी कि राज्य, केंद्र सरकारें बाजार से कर्ज लेकर अपना खर्च चलाते हैं. कब तक केंद्र और राज्य सरकारें केवल बाजार से उधार लेकर सरकार का खर्चा चलाएंगी. पैसा इकट्ठा करने का सरकार के पास सिर्फ एक साधन है वो है टैक्सेशन, लेकिन 130 करोड़ की जनता से जितना टैक्स मिलना चाहिए वो नहीं मिलता है. लगातार सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को अपना राजस्व बढ़ाना होगा और इसका सही तरीका वही है कि देश में जिसपर जितना टैक्स बनता है वो उतना टैक्स दे.

अब तक हो रही टैक्स चोरी का सबसे बड़ा उदाहरण
डायरेक्ट टैक्सेशन में 130 करोड़ लोगों के देश में सिर्फ 78 लाख लोग 5 लाख से ज्यादा टैक्स देते हैं और इसमें से 61 लाख लोग सैलरी क्लास हैं. यानी वकील, सीए, डॉक्टर, मैन्यूफैक्चरर, ट्रेडर, कारोबारी, दुकानदार जो टैक्स देते हैं वो सिर्फ 17 लाख हैं. ये क्या संभव है? वहीं सर्विस टैक्स, वैट और एक्साइज ड्यूटी वाले जो टैक्स खत्म किए गए हैं, उसके तहत सिर्फ 80 लाख लोग रजिस्टर्ड थे जो देश की जनसंख्या का 0.1 फीसदी है. यानी सैलरी क्लास के अलावा देश की जनसंख्या का आधा फीसदी भी पुराने टैक्स सिस्टम से टैक्स के दायरे में नहीं आता था.

जीएसटी के विरोध के पीछे तर्क सही नहीं
जीएसटी के विरोध के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि सॉफ्टवेयर अपडेशन की समझ ना होने के चलते छोटे कारोबारियों को दिक्कत आएगी इसका साफ जवाब है कि जीएसटी से वो सब करोड़ों-अरबों के टर्नओवर वाली कंपनियां टैक्स के दायरे में आएंगी जो अभी तक कमजोर टैक्स सिस्टम के चलते टैक्स चोरी करने में सफल होती थीं. कोई भी परिवर्तन आता है तो टेक्नोलॉजी से जुड़ी परेशानियां जरूर आती हैं. लेकिन कुल मिलाकर जो आखिरी व्यक्ति है जिस पर टैक्स लग रहा है वो कंज्यूमर है लेकिन जीएसटी का विरोध कंज्यूमर ने नहीं बल्कि ट्रेड संस्थाओं ने किया क्योंकि इनमें मौजूद बिचौलिए या मध्यस्थों को अपनी टैक्स चोरी की आदत बदलनी पड़ेगी.

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